#बस_यूँ_ही #गुडमैन_दी_लालटेन...

 #बस_यूँ_ही
#गुडमैन_दी_लालटेन...

अतीत के कुछ पन्ने.... 80 का दशक.... लालटेन युग...
हम उस विकासशील दशक के वाहक है जिन्होंने लालटेन युग से निकलकर डिजिटल युग में प्रवेश किया है ! आज की पीढ़ी बचपन से फेसबुक ट्विटर की दुनिया से भले वाकिफ हो, पर कई पुरातन चीजें उनके समक्ष नहीं हैं....
पर हमने इस बदलाव के हर चरण को महसूस किया है ! पुरानी यादें भी साथ और... नए ख्वाब भी सजते जा रहे है !
लालटेन..... हल्के लोहे के फ्रेम में फंसी ... उससे भी हल्की काँच की चिमनी वाली...मिट्टी के तेल से जलने वाली... लालटेन....!! कभी हर घर का अभिन्न अंग हुआ करती थी.. ...
लालटेन तो हुई.... पर... "गुडमैन दी लालटेन"...??
उसकी एक अलग कहानी है...
आजादी से पहले.. सेना में गुडमैन कम्पनी की लालटेन का प्रयोग बहुतायत से होता था... जो अपनी गुणवत्ता और लंबे समय तक चलने के लिये, मशहूर थी.. "goodman's lanterns" को ही भारतीय सैनिक " गुडमैन दी लालटेन" बुलाते थे... ये phrase इतना catchy था कि... अंग्रेज अफसरों की जुबान पर चढ़ गया... और वो इसे मज़ाक में अपने जूनियर अफसरों को शाबाशी देने के लिये इस्तेमाल करने लगे..." गुडमैन दी लालटेन" "शाबाशी" का पर्याय बन गई.....
बाद में धीरे धीरे ये जनमानस में भी प्रचलित हो गया.... ख़ासकर पंजाब और उत्तर भारत में...
कहना न होगा कि.. गुडमैन की लालटेन.. क्वालिटी में बढ़िया थी .. तभी.. सेना के अलावा भारतीय रेल भी, दशकों तक इन्हीं की बनाई लालटेन प्रयोग करती रही... रात में ट्रेनों को सिग्नल देने के लिए...!!
घरों में प्रयोग होने वाली लालटेन से इतर , इन लालटेनो को इस प्रकार बनाया जाता था कि, इन पर हवा का असर न हो.... साथ ही, चूंकि इन्हें सिग्नल देने की लिये इस्तेमाल किया जाता था तो, इनके लोहे के cylindrical फ्रेम में सिर्फ एक तरफ बड़ा सा गोल शीशा लगाया जाता था.... ताकि रोशनी सिर्फ एक ही तरफ से दिखाई दे... सिग्नल के लिये लाल और हरे रंग के शीशे इस्तेमाल किये जाते थे... कुछ लालटेन ऐसी भी होती थीं... जिनमें शीशे का एक sliding panel होता था... जोकि आधा लाल और आधा हरा होता था.... एक नॉब की सहायता से शीशे को आगे पीछे खिसका कर....एक ही लालटेन से... लाल और हरे कलर की लाइट का प्रयोग किया जा सकता था....
ऐसी लालटेन को.. हाथों में लेकर... करीब से देखने का अवसर भी, बचपन में मिला.... पिता जी की रेल्वे को नौकरी के कारण...
आज लालटेन युग बीत चुका है, लेकिन प्रकाश से भरे सफर में इसकी रौशनी कभी मद्धम नहीं हुई है; ये एक सभ्यता थी जिसका हम हिस्सा थे !
आखिर में एक खूबसूरत कविता... लालटेन तले : सुजीत भारद्वाज
शाम की धमाचौकरी को
एक फटकार विराम लगाती थी,
पैर पखारे सब लालटेन तले
अपनी टोली सी बन जाती थी!
जोर जोर से पड़ते थे,
हिंदी की किताबे..
लगता था एक होढ़ सा,
हर आँगन से वही आवाजे आती थी !
नहीं हुआ है, अभी सवेरा,
और खूब लड़ी मर्दानी की गाथा,
हम जोर जोर से गाते थे,
कुर्सी पर बैठे दादा जी धीमे से मुस्काते थे !
जब पलके भारी हो जाती थी,
जब लालटेन धीमा पर जाता था !
आँखे बोझिल होने से पहले,
माँ थाली ले आ जाती थी !
और अपना मन, लालटेन तले,
बचपन में खो जाती थी !
धीरे धीरे ये सुन लालटेन भी सो जाती थी !
............. इति.............
#गुरमीत_सिंह_मोंगा

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